Tuesday, August 10, 2010

जे है बुंदेलखंड /

बुंदेलखंड के पहाड़ खुद कर, मध्य / उत्तर प्रदेश के शहरों में कृतिम पहाड़ में बदल गए, इस प्रक्रिया में लाखों टन डीजल धुआं बन कर पूरे आसमान में छा गया / पेड़, जंगल भी ईट भट्ठों और आरामदायक कुर्सियां और बिस्तरों में बदल गए / और हम कहते है की बुंदेलखंड में सूखा है, बुंदेलखंड मरुस्थल बन रहा है और हमारी सरकार कुछ नहीं कर रही है / जे बात सरकार सुन करके जो करेगी उसमे भी भ्रष्टाचार होगा और अपन चीलम पीते हुए कहेंगे कि, ' जेही किस्मत है बुंदेलखंड की " / अरे जागो अब नहीं जागोगे तो फिर जागने का कोई मौका नहीं मिलेगा मुसीबत अब नाक तक पहुच गयी है / उड़ीसा से जिस तरह पत्नी खरीद कर लाते हो, उसी तरह उड़ीसा से पानी भी लाना पडेगा /

और बुंदेलखंड की स्थिति पर चलचित्र वाली आख्या तैयार करने वाले कमाल खान जो कि, एन डी टी वी के पत्रकार है, को इस वर्ष राम नाथ गोयनका सम्मान से नवाजा गया है / बधाई उन्हें । किसी को तो लाभ हुआ बुंदेलखंड से /

कमाल खान की चलचित्रों वाली विशेष आख्या के लिए यहाँ क्लिक करे

लाभ कुछ अन्य लोगों को भी हो रहा है बुंदेलखंड में लेकिन उनकी गिनती बहुत कम है / यह लोग या तो पहाड़ खोदने वाले ठेकेदार है या फिर पत्थर तोड़ कर गिट्टी बनाने वाले या सिलिका बनाने वाले / एक और बिरादरी है बुंदेलखंड में जो कि लाभ कमा रही है इस बदहाल, भूखे और गरीब बुंदेलखंड में इस बिरादरी को कहते है, गैर सरकारी संगठन / यह सारे गैर सरकारी संगठनों के प्रमुख करता धर्ता को लाभ ही लाभ हो रहा है / कई लोग तो ऐसे है जिन्होंने बचपन में साइकिल की सवारी भी नहीं की थी, घर की आर्थिक स्थिति अच्छी न होने की वजह से लेकिन आज कल वे वातानुकूलित कारों में चलते है और गैर सरकारी संगठन नामक कारखाने के मुखिया है /
बुंदेलखंड में सूदखोरी से होने वाली हत्याओं ( आत्म ह्त्या ) का ग्राफ भट्ठे की चिमनी के धूए की तरह हर महीना ऊपर उठता है / गरीबी का चरम यह है कि एक घर में दो से अधिक महिलाएं तो है, लेकिन घर में साड़ी एक ही है , जिसे बाहर निकालने वाली महिला पहनती है, घर के अंदर की महिलाए आधे - अधूरे वस्त्रों में अपने शरीर को किसी तरह तोपे ढांके बैठी रहती है / एक साथ यह महिलाएं घर से बाहर भी नहीं निकल सकती है /


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