Tuesday, July 20, 2010

मन

आज मन पता नहीं क्यों प्रफुल्लित है / मन को तो सदैव प्रफुल्लित रहना चाहिए / लेकिन मन को प्रफुल्लित रखने का कोई तय सूत्र नहीं है, ना ही किसी वैज्ञानिक ने शोधने की कोशिश की, हो सकता है किया भी हो लेकिन मेरी जानकारी में नहीं है / अगर सफल हुआ होता शोधने में तो शायद जानकारी में होती / अब सवाल फिर से आता है की मन को प्रफुल्लित कैसे रक्खे या मन कभी - कभी प्रफुल्लित क्यों रहता है ? आज मन क्यों नहीं लग रहा है किसी काम में ? मन चिंतित है व्यथित है और ना जाने क्या क्या /शरीर के किस हिस्से में मन होता है मन दिखने में कैसा है ? यह ठीक उसी तरह से है जैसे प्यार और दिल / हम दिल दे चुके सनम - सनम आपके दिल से कौन सा खेल खेलेंगे और आप बिना दिल के कहा मौज करोगे ? दिलवाले दुल्हनियां ले जायेंगे सब के सब तो दिलवाले है, कौन है बिना दिल का जो दुलहनिया ले जाएगा / प्रफुल्लित मन लिए दिल दुलहनिया के चक्कर में मै कहा आ फसा, काफूर हो गया प्रफुल्लन सताने लगी दुनियावी चिंताये /

No comments: