Tuesday, July 20, 2010

मन

आज मन पता नहीं क्यों प्रफुल्लित है / मन को तो सदैव प्रफुल्लित रहना चाहिए / लेकिन मन को प्रफुल्लित रखने का कोई तय सूत्र नहीं है, ना ही किसी वैज्ञानिक ने शोधने की कोशिश की, हो सकता है किया भी हो लेकिन मेरी जानकारी में नहीं है / अगर सफल हुआ होता शोधने में तो शायद जानकारी में होती / अब सवाल फिर से आता है की मन को प्रफुल्लित कैसे रक्खे या मन कभी - कभी प्रफुल्लित क्यों रहता है ? आज मन क्यों नहीं लग रहा है किसी काम में ? मन चिंतित है व्यथित है और ना जाने क्या क्या /शरीर के किस हिस्से में मन होता है मन दिखने में कैसा है ? यह ठीक उसी तरह से है जैसे प्यार और दिल / हम दिल दे चुके सनम - सनम आपके दिल से कौन सा खेल खेलेंगे और आप बिना दिल के कहा मौज करोगे ? दिलवाले दुल्हनियां ले जायेंगे सब के सब तो दिलवाले है, कौन है बिना दिल का जो दुलहनिया ले जाएगा / प्रफुल्लित मन लिए दिल दुलहनिया के चक्कर में मै कहा आ फसा, काफूर हो गया प्रफुल्लन सताने लगी दुनियावी चिंताये /

Friday, July 16, 2010

मेरा आवांछित जीवन साथी

मुझे एक अदद जीवन साथी मिल गया है / जीवन साथी जिसको न तो मै चाहता था और ना ही मेरे परिवार वाले / बिलकुल आप्रत्याशित तरीके से मिला मुझे मेरा जीवन साथी / कोई ५ दिन पहले की बात है, मै बैंग्काक के सेनाके विशेष चिकित्शालय में दाखिल हुआ अपने सर में लगातार दर्द के वजह से / दाखिल होते ही चिकित्सकों नेपहला सवाल पूछा की कभी पहले ऐसा हुआ था ? तो मुझे हांग काँग याद आ गया, मै वहा भी इन्ही कारणों सेअस्पताल में दाखिल हुआ था / मैंने सच - सच पूरा पुराना प्रकरण सूना दिया / आदेश मिला की चुम्बकीयअनुनादी चित्रण होगा आपके मस्तिष्क का / मै थोड़ा सहमा लेकिन अगले ही पल सचेत हुआ की, पहले भी तो होचुका है हांग काँग में, मैंने अपनी स्वीकृत देने में एक क्षण भी नहीं जाया किया / उसके बाद चौकने की बारी मेरीथी, हांग काँग में ३ थक्के थे मेरे दिमाग में और यहाँ ८ थक्के मिले अनुनादी विश्लेषण के बाद / संभालना खुद कोकठिन प्रतीत हुआ एक क्षण के लिए लेकिन संभाला मैंने खुद को / विशेषज्ञ चिकित्सक का आदेश हुआ की मैतत्काल भर्ती हो जाऊ, लेकिन मेरा दुर्भाग्य कहिये या सौभाग्य की अस्पताल में कोई बिस्तर खाली ही नहीं था / इसलिए आज मै यह सब लिख पा रहा हूँ / परन्तु चिकत्सक ने अस्पताल छोडने से पहले बता दिया की बिस्तरखाली होते ही हम आपको आपके दूरभाष पर सूचित करेंगे और आप बिना किसी विलम्ब के उपस्थित होंगे / मैंनेसप्रेम हां में अपना सिर हिला दिया / देखेंगे कल क्या होगा /
चिकित्सक ने बताया की हम आपकी शैल्याचिकित्षा नहीं कर सकते, यह बीमारी अब तो आपके जीवन भर रहेगीऔर आपको आजीवन दवा खानी पड़ेगी / मै सोच में पड़ गया की पुरूष तो केवल पत्नी के साथ जिंदगी भर जीवनजीने का व्रत लेता है / मेरे बगल में तो यह बीमारी खड़ी है ज़िंदगी भर के लिए / खैर क्या कर सकते है, मुबारक होमुझे मेरा यह जीवन साथी /
कैसे कहू
कैसे छुपाऊ
न कहू तो कैसे पचाऊ
पेट में आखिर सब बात पचती भी तो नहीं है
किया बहुत कोशिश
लेकिन अब हारता दिख रहा हूँ
कैसे चुप रहू
कह दू
चुप रहू
क्या समझेंगे लोग
कमजोर
दया दिखाएँगे
या फिर हँसेंगे
बेहतर होगा
चुप रहू
देखेंगे
करेंगे कोशिश
दम समेट कर
आखिरी बार


Thursday, July 8, 2010

यह कैसा आपातकाल ?


थाईलैंड के १९ मंडलों में आपातकाल पिछले ३ महीने से लागू है, लेकिन यह आपातकाल कही पर नज़र नहीं आता है / कल शाम को यूँही मै बैंग्काक के खाउसन रोड पर जा पहुचा, खाउसन रोड विदेशी पर्यटकों का पसंदीदा जगह माना जाता है / यहाँ कल भी उतनी ही चहल पहल थी जितनी की ३ महीना पहले या उससे पहले हुआ करती थी / आपातकाल को ठेंगा दिखाते हुए सारी दुकाने, मयखाने अपने पूरे अंदाज़ में पर्यटकों के लिए खुले हुए थे / सड़क परपूरी दुनिया के पर्यटक चहलकदमी कर रहे थे / मै एक रेस्तरां में बैठ कर अपने खिचड़ी हो रहे बालो पर उंगली फेरते हुए थाईलैंड, आपातकाल और खाउसन रोड पर खुद से ही परिचर्चा करने लगा / क्या देश है क्या कानून है ? हमारे यहाँ तो अगर धारा १४४ लागू हो जाती है तो बाज़ार और आम जन जीवन पर प्रभाव पडने लगता है, कर्फ्यू और आपातकाल में तो जन जीवन ठप ही हो जाता है / यहाँ आपातकाल में भी कोई समस्या नहीं है / और खाउसन रोड ही क्या पूरा बैंग्काक ऐसे ही अपने पुराने ढर्रे पर है / मई के महीने में बैंग्काक के एक दर्जन से अधिक व्यावसाईक इमारतों में आग लगा दी गयी थी एक हिंसक भीड़ के द्वारा / यह वीरान और भुतही सी जली हुई इमारते क्या सोचती होंगी ? इन्हें अपने जल जाने पर तरश भी आता होगा, और बाकी सारे शहर पर यह लानत भी देती होंगी, और शायद मन ही मन यह भी कहती होंगी की कभी हमभी जवान थे कभी हम भी हिस्सा थे इस शहर के /

"ज़िंदगी कभी पीछे मुड कर नहीं देखती है, कल को भुला कर आज में जीने लगती है"

बैंग्काक भी ऐसा ही है, बहुमंजिली बाज़ार के जल जाने के बाद फुटपाथ पर दुकाने खुल गयी / धंधा नहीं होगा तोज़िंदगी कैसे चलेगी, धन तो कमाना ही है कल तक वातानुकूलित बहुमंजिली इमारत में दूकान थी ,और आज टेंट के नीचे फुटपाथ पर / कुछ मंदा ही सही लेकिन धंधा शुरू हो गया / इसे जीवटता कहेंगे या समय के साथ समझौता, मै नहीं तय कर पा रहा हूँ /


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Tuesday, July 6, 2010

अंतिमसंस्कार के बहाने /

कल शाम को बैंग्काक के एक बुद्धिस्ट मंदिर में जाना हुआ / मेरे एक परिचित के पिताजी का देहांत हो गया था एकदिन पहले / मै कल जब जपैया नदी पार करके बुद्धिस्ट मंदिर पहुचा जहा पर एक बड़े से हाल के अंदर रंग बिरंगेपुष्पगुच्छों के मध्य एक सफेत ताबूत रक्खा हुआ है जिस पर सुनहरे रंग की नक्काशी की गयी है / हाल के एकतरफ चबूतरे पर ५ बुद्धिस्ट मोंक बैठे हुई थे और बाकी हाल में कुर्सियों पर मृतक के रिश्तेदार और जान पहचानवाले बैठे थे / मैंने भी एक खाली कुर्सी को भर दिया और कौतूहल वश प्रार्थना सभा को देख रहा था जो सुनायी दे रहाथा वह समझ से परे था / मन को थाम कर बैठा हुआ था तभी एक और परिचित मेरी कुर्सी के बगल वाली कुर्सी परखुद को स्थापित करते हुए मुस्कुरा कर सबाती ख्राब बोले मैंने दबे मन से जवाब तो दिया लेकिन सोचने भी लगामृत आत्मा के प्रार्थना सभा में भी कोई इस तरह से मुस्कुराकर अभिवादन करता है / मैंने अपनी झेप मिटाने केलिए जब दूसरी दिशा में देखा तो पडोश वाला चित्र चहुओर नज़र आया / मैंने खुद को सामान्य करने की कोशिशकी और पड़ोसी से पूछ बैठा की अंतिमसंस्कार कब होगा ? जवाब एक क्षण के लिए चौका देने वाला मिला, एकहफ्ते के बाद होगा मैं दूसरा सवाल पूचता उसके पहले वे खुद ही बताने लगे की, हम बुद्धिस्ट लोगों में यह परम्परा हैकी शव को मंदिर में ३,५,या फिर ७ दिन तक रखते है और रोज शाम को प्रार्थना होती है और मंदिर में ही रात्रिभोजहोता है / आठवे दिन यदि शनिवार नहीं है तो दिन के समय मृत देह को अग्नि को समर्पित कर देते है / प्रार्थना मेंशामिल होने वाले लोग या तो काले कपडे पहनते है या फिर सफ़ेद / दूसरे रंग के कपडे वर्जित होते है / मृत देह कोजलाने की व्यवस्था भी मंदिर के प्रांगण में ही होती है / पूर्व में जलाने के लिए लकडियों का इस्तेमाल होता थालेकिन आज कल विद्युत से यह अंतिम कार्यक्रम संपन्न होने लगा है / आने जाने वाले परिचित लोग मृतक केपरिवार को कुछ आर्थिंक सहायता भी करते है / बुद्धिस्म के बारे में हालांकि मेरा ज्ञान कमजोर है फिरभी जबभीमौक़ा मिलता है तो समझने की कोशिश करता हूँ / जिज्ञासू मन को रोका भी तो नहीं जा सकता है न /

Friday, July 2, 2010

झमेला मेंटर का /

बहुत दिनों से मै समझ नहीं पा रहा था एक शब्द का सही सही मतलब, यह शब्द अंग्रेज़ी भाषा का 'मेंटर' है / कई संभ्रांत और विद्वान जनों से मिलना हुआ इन दिनों, सभी ने दिया तो ढेर सारा उपदेश लेकिन माना नहीं की उपदेश दिए है, छूटते ही कहा की आपकी तो अच्छी मेंटरिंग हो गयी / मैं भारी चिंता में पड़ गया की यह क्या मुसीबत है मेंटरिंग / दिया तो उपदेश अच्छा काम करने के लिए, उकसाया की वंचितों की लड़ाई से पीछे न हटू मैं यह मेंटरिंग बीच में कहा से आ गया / याद आया जब विश्वविद्द्यालय में पढ़ा करता था तो 'मेंटल' नामक एक शब्द का उपयोग कूट शब्द की तरह हम लोग किया करते थे, फला तो मेंटल है / मेंटल माने शहरी जीवन में रचा - बसा नहीं है गवईपन है उसके व्यक्तित्व में / मेंटल और मेंटर में कोई सम्बन्ध तो नहीं है, या मेंटर मेंटल जैसा अधिक समझदार लोगो के बीच का कोई कूट शब्द है / इसे मेंटर और मेंटल के झोलमझेल में काफी समय जाया हुआ / फिर ख़याल आया की इन्टरनेट के पास तो हर सवालों के जवाब बिल जाते है तो मैंने भी अपनी मुसीबत इन्टरनेट के हवाले कर दिया / इन्टरनेट ने जो जवाब दिया उसे मै पूर्ण रूप से समझ तो नहीं पाया लेकिन इतना समझ पाया की मेंटर का मतलब अंग्रेज़ी के शब्द काउंसलर से मेल खाता है, काउन्सलर जो की सलाह देता है / मामला और गंभीर होता दिखा इसलिए यहाँ आ बैठा और अब आप सब प्रबुद्ध ब्लागबाजो से मदद चाहता हूँ मेंटर को समझाने में / कृपया जल्दी मदद पहुचाइयेगा /

Wednesday, May 13, 2009

गैर सरकारी संगठनों का कानून से उठता भरोसा .

आज कल गैर सरकारी संगठनों में एक नया चलन शुरू हुआ है, चलन नए तरीके के संघर्ष का । इस नए तरीके में लड़ाई कानून या कचहरी में न लड़ करके इन्टरनेट और मोबाइल से लड़ते है । यह वो लोग है, जो की कानून के राज़ (रूल ऑफ़ ला ) की बात करते है । लेकिन ख़ुद कानूनी लडाई लड़ने से या कानूनी कार्यवाही से डरते है, इस लिए यह तथाकथित समाजसेवी ख़ुद को मानवाधिकार कार्यकर्त्ता कहलवाने वाले मोबाइल से संदेश और इन्टरनेट से मेल भेज करके लडाई लड़ते है । इसके पीछे मकसद कोई लडाई लड़ने की नही होती है लड़ने का नाटक करते है जिससे लोगों के बीच इस बात का भ्रम बना रहे कि यह सज्जन लगातार खतरों से घिरे रहकर भी कानून का राज स्थापित कराने की दिशा में रात दिन एक किए है । लेकिन वास्तविकता इससे इतर होती है । इनका मकसद वास्तव में कुछ उन लोगों कि सहानुभूति जुटाना होता है जो कि, इन गैर सरकारी संगठनों को आर्थिक मदद पहुँचाने का काम करते है । ऐसे समाजकर्मी समाज में वंचित और पीड़ित को कौन सी लड़ाई लड़नी सिखायेंगे जिन्हें ख़ुद अपनी लड़ाई लड़नी नही आती है । ऐसे निरीह प्राणी जो कि अपने आप से जुड़े सच को उजागर नही होने देते है और अपनी लडाई लड़ने के बजाय केवल जानने पहचानने वाले और दान दाता एजेंसियों के मध्य मोबाइल और ईमेल से संदेश भेजते है । मुझे हैरत हो रही है यह सब जान करके और तरश आता है इनकी समझदारी पर, इनकी मदद अगर इस देश का कानून और पुलिस नही कर सकती तो कौन सी दान दाता कम्पनी है जो इनकी मदद करेगी ।
दलित, पीड़ित और वंचित लोगों कि कैसे रक्छा हो पायेगी उनके ऊपर हो रहे शोषण से जब, इन लोगों के मसीहा कहलाने वाले लोग और उनके कार्यालय ही सुरक्षित नही रहे ।

Sunday, April 26, 2009

मेरी आकांछा .

ज़िन्दगी से जंग जारी है
बिना किसी शिकवा व शिकायत के
जियें जा रहा हूँ
इस उम्मीद से
की कुछ पद चिह्न छोड़ सकूं
पद चिह्न ज़िन्दगी के साथ संघर्ष का
पद चिह्न आज की हकीकत का
जो कल लोगो को कहानियाँ सुनाये
जो आज बीत रही है
जिससे लोगो की चेतना में बदलाव आए
यह कोई संघर्ष गाथा नही होगी
यह कहानी होगी
एक आम आदमी की ज़िन्दगी की
जिसे उसने जिया ज़द्दोज़हद में ।

प्रशांत भगत

Monday, April 20, 2009

बुन्देखंड क्या फ़िर से आबाद हो पायेगा ?

बुन्देखंड क्या फ़िर से आबाद हो पायेगा ?
ऐसा लगता तो नही है, और मैं निराशावादी भी नही हूँ । लेकिन आज जिस कदर बुंदेलखंड में प्राकृतिक संसाधनों का दोहन बिना सोचे समझे हो रहा है, उससे अब बुंदेलखंड में पुनः सामान्य जन जीवन हो पाना मुश्किल ही नही अपितु असंभव जान पड़ता है। सामान्य जन जीवन की बहाली बुंदेलखंड में अब उतनी ही कठिन है जितना कठिन मरुस्थल में दूब उगाना है । मरुस्थल की ओर, आज बुंदेलखंड अग्रसर है और शायद एक से डेढ़ दशक लगेंगे जब बुंदेलखंड में भी मरुस्थल की तरह रेत के टीले और उनके पीछे पानी का आभास दिलाते हुए मृग मरीचिका दिखाई पड़ेगी। आज छतरपुर शहर में दोनों वक्त पानी नलों में नही आते, दोनों वक्त की तो छोडिये रोज़ भी नही आता है, एक दिन छोड़ करके आता है यहाँ के नलों में पानी । अब ऐसे में नगरवासी किस तरह से रोज़ के जीवन में जल प्रबंधन करते होंगे शोध का विषय हो सकता है । यह तो हाल है छतरपुर का बाकी के जनपद जो बुंदेलखंड क्षेत्र में आते है उनका भी हाल कुछ ऐसा ही है । छतरपुर और पन्ना जिलों के मध्य पन्ना घाटी है, पन्ना घाटी कुछ वर्ष पहले तक सालभर हरी भरी रहती थी लेकिन अब पाना घाटी के जल श्रोत सूख रहे है धीरे-धीरे, जिसका सीधा असर घाटी में स्थिति पेड़ पौधों पर पड़ रहा है । हरी भरी घाटी अब उजडे जंगल सी दिखने लगी है । महोबा जिला जो की उत्तर प्रदेश में पड़ता है उसकी भी स्थिति कुछ ऐसी ही है , यहाँ बड़े तालाबों को सागर कहते है लेकिन यह सागर भी अब अपने स्थिति पर आंसू बहा रहे है । महोबा से १५-१७ किलोमीटर दूर कबरई है जो की किसी युद्ध क्षेत्र की तरह दिखने लगा है, सफ़ेद पेड़, खेतो में एक मोटी परत पत्थर तोड़ने की प्रक्रिया में उड़ने वाली धूल की , कल तक जहा पहाड़ थे, आज वहां सैकडों फिट गहरी खाई है । लोगो के चहरे पर मुर्दनी छाई रहती है बहुतो ने अपनी आँखे गँवा दी है, और बहुतो के फेफड़े सड़ गए है सिलिका नामक धूल के कणों से । इन सब की वजहों से हर साल बुंदेलखंड से लाखों की संख्या में बुंदेलखंड वासी पलायन कराते है महानगरों की ओर, जहा पर इनकी भूमिका जादातर निर्माण मजदूर की होती है । यह बुन्देली लोग जब जल और सूखे की समस्या से भागते है महानगरों की ओर तबभी इनकी स्थिति में कोई बदलाव नही होता है । इन्हे तपती दोपहरी में काम करना पड़ता है और रात को किसी नदी, नाले या पुल के नीचे स्थित झुग्गी-झोपडी में रात बितानी होती है जहा पर इनके साथ वह साड़ी समस्याएँ खड़ी रहती है जिनसे बचने के लिए यह लोग बुंदेलखंड से पलायित होते है । एक पुरानी कहावत है धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का । वाह री हमारी कल्याणकारी सरकारें क्या यह सारे लोग इन्ही सब चीजो के लिए अपनी गाढ़ी कमाई से कर देते है । इनसे वसूले जाने वाले कर का हिसाब क्या कभी हमारी सरकारें दे पाएंगी या इनके साथ न्याय कर पाएंगी । बहुत कठिन है इस बारे में कह पाना भी । किसी भी राजनैतिक दल के घोषणा पत्र
में इन सब लोगो से जुड़ी कोई भी सीधी बात का भी अकाल है, किसी के लिए यह मुद्दा नही है । महानगरों के झुग्गियों में रहने वाले लोग महानगरों के मतदाता नही है और चूंकि यहाँ से पलायन कर गए है तो यहाँ भी मतदान में उनकी भूमिका नगण्य है, मेरी समझ से शायद इसी लिए किसी भी राजनैतिक दल को इनकी सुध लेने की जरूरत नही पड़ती ।
बुंदेलखंड की कहानी अधूरी रह जाती है अगर हम बुंदेलखंड के मवेशियों का जिक्र न करें । बुंदेलखंड में एक प्रथा मवेशियों से जुड़ी हुई है जिसे बुन्देली लोग अन्ना प्रथा कहते है । यह प्रथा सदियों पुरानी है, जिससे यह प्रमाणित होता है की बुंदेलखंड में सदियों से सूखा पड़ता रहा है कुछ वर्षो के अंतराल के साथ , लेकिन उस समय वन और वनस्पति भरपूर मात्रा में थी जिसकी वजह से सभी किसान गर्मी के दिनों में अपने पशुओं को छुट्टा छोड़ देते थे । इस छुट्टा छोड़ देने की प्रथा को ही अन्ना प्रथा कहते है । यह सारे छुट्टा मवेशी वनों के भरोसे गरमी का मौसम बिताते थे, गर्मी के बाद जैसे ही बरसात आती थी तब किसान अपने पशुओं को दूंढ -ढांढ कर लाते थे । आज भी बुंदेलखंड में यह प्रथा लागू है लेकिन अब पशु वनों के बजाय सड़कों और सूखे खेतों में आवारगी करते है । जल और घास के संकट से जूझते हुए यह मवेशी बड़ी संख्या में काल के गाल में समा जाते है । कितने पशु मरे और क्यों मरें इन सबका हिसाब किताब रखने वाला कोई नही है ।
बुंदेलखंड में लगभग २९००० तालाब है जिनमे से अधिक्तर आज कीचड और गन्दगी की वजह से उथले हो गयी है या फ़िर पहाड़ के ख़ुद जाने से उनमे अब पानी आने का रास्ता नही रह गया है । पूर्व में यह सारे तालाब वर्ष भर बुंदेलखंड के लोगो और मवेशियों को जल उपलब्ध कराते थे। आज इन सारे तालाबों को ही किसी तारनहार की जरूरत है, इन तालाबों को अगर फ़िर से व्यवस्थित किया जा सके तो शायद बुंदेलखंड के बहुत सारे जानवरों को बिना पानी के मरने से बचाया जा सके और इसके साथ ही जो भूगर्भ जल तैयार होगा वह यहाँ के लोगो की प्यास बुझा सकेगा ।

हमारी सरकारें चाहे वह राज्य की हो या फ़िर केन्द्र की उनमे से कोई भी शुद्ध पेय जल की उपलब्धता को जीवन जीने के अधिकार (अधिनियम २१ ) के तहत क्यों नही लाती है । क्यू लायेगीं जब चिकित्सा सुविधा या भोजन अधिकार को आज तक नही ला पायी । यह विडम्बना है दुनिया के सबसे बड़े लोकतान्त्रिक देश का जहाँ पर - जनता के द्वारा, जनता पर , जनता का शासन होता है ।
प्रशांत भगत के साथ बलवंत ताऊ

बुंदेलखंड परेशान है .

बुंदेलखंड,
आज बहुत उदास है।
उदास है ?
नही परेशान है ।
परेशान है ?
नही प्यास से बिलबिला रहा है ।
अरे अभी तो चुनाव है वहां,
फिरभी है समस्या ?
कुछ भी हो यहाँ।
यह समस्याएँ अब यहाँ की संस्कृति का हिस्सा है ।
पानी की किल्लत ,
नहाना तो दूर शुद्ध पीने का पानी नही मिलता ।
गर्मी इतनी शुष्क होती है,
कि पसीना भी शरीर पर नही टिकता ।
ऐसे में बुन्देली लोग कैसे टिके रहते है वर्ष भर ?
कहाँ टिकते है ,
भारी संख्या में पलायन कर जाते है,
मृग मरीचिका का पीछा करते हुए।
और फ़िर घुटते है,
शहर की झुग्गियों में,
बिना पानी के,
आस पास गंध मारते कूड़े के ढेर के साथ ।
महानगरों के हासिये पर यह आबाद झुग्गियां,
केवल बुन्देली लोगों की नही है ।
ऐसे सभी लोगों की है जिनकी स्थिति,
बुंदेलखंड जैसी है ।

प्रशांत भगत